प्रयागराज में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसे न्याय व्यवस्था और पुलिस जवाबदेही के क्षेत्र में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। अदालत ने साफ कहा है कि बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए किसी भी नागरिक को हिरासत में रखना या जेल भेजना संविधान के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।
यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने मंसूर अहमद उर्फ लल्लू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की सुनवाई के दौरान दिया। मामले में एक व्यक्ति को 8 दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखने पर अदालत ने ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया और यह राशि संबंधित तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के वेतन से वसूलने के निर्देश दिए.
मामले का विवरण
मामले के अनुसार, मंसूर अहमद को 19 मार्च 2026 की रात पुलिस द्वारा उसके घर से उठाया गया था। पुलिस ने BNSS की धारा 126, 135 और 170 का हवाला देते हुए कार्रवाई की थी। बाद में उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां पर्याप्त कानूनी सुनवाई और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और उसे जेल भेज दिया गया.
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में कहीं यह उल्लेख नहीं था कि आरोपी ने व्यक्तिगत बांड भरने से इनकार किया था.
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था में मजिस्ट्रेटी शक्तियों का कई जगह दुरुपयोग हो रहा है। अदालत ने यह भी बताया कि कई जिलों में शांति भंग के मामलों में लोगों को बिना उचित प्रक्रिया के लंबे समय तक हिरासत में रखा जा रहा है.
महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश
हाईकोर्ट ने पूरे उत्तर प्रदेश के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
- शांति भंग की कार्रवाई में अधिकतम ₹20,000 का व्यक्तिगत बांड ही लिया जाएगा
- किसी बाहरी जमानती की आवश्यकता नहीं होगी
- बांड भरते ही तुरंत रिहाई अनिवार्य होगी
- 24 घंटे से अधिक अवैध हिरासत पर ₹25,000 प्रतिदिन मुआवजा दिया जाएगा
- मुआवजा राशि दोषी अधिकारी या मजिस्ट्रेट के वेतन से वसूली जाएगी
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कानूनी महत्व
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करेगा। साथ ही यह नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.